لقب.. قصيدة نثرية

عندما منحتك لقب.. حبيبي

عقلي هو الذي قرّر..

لم يكن قراراً قلبياً.. كعادتي..

فلقد كان الإيمان يملؤني..

أنك نلت هذا الشرف بجدارة.. 

فقبلك.. مرّ عليّ كثيرون..

ومعك .. مر عليّ آخرون

لكن..

لا أحد منهم..

حولني إلى غيمة.. 

أسكنني فسحة السماء..

علمني لغة بوح الطيور..

أخذ بيديّ نحو بلاد الحب..

لا أحد منهم..

منحني شرف عشق قلمي..

فك وثاق حنجرتي.. 

طيّرني كطفل صغير بين ذراعيه..

لا أحد منهم..

توسّد أضلعي.. 

فاختار شكلي وهيأتي.. 

وصيّرني انعكاساً لجمال ..

أنا.. نفسي..

ما كنت أعلم أن منبته قائم فيّ..

فأمطرني.. 

أنا التي كنت أظنني عقيماً لا أنجب..

لا أحد منهم..

فصّل لي ثوب حريتي على مقاسي..

عرّج مسالك الطريق.. لتطاوعني..

رمم أجنحتي.. 

وأعاد إليّ.. ثقتي بي..

تلقف غصاتي.. عوضاً عني..

وأصعدني سلم النجاة.. 

مصراً على دفعي..

خطوة بخطوة..

لا أحد منهم..

حفر أعماق قلبي..

ليستخرج منه عنبره المدفون..

طوّف حوله.. كل ذرات بدني.. 

حتى حسبته القبلة التي عليّ أن أصلي إليها..

أمعن في تشذيب أظافر ملامحي.. 

فصارت له مطواعة.. 

تأتمر بأمره وتنتهي.. بمنتهاه

لا أحد منهم..

جاءني على هيئة فجر.. 

وعاملني معاملة فجر.. 

وصاغ مني.. شمساً

أحاطها بأقماره وببركاته..

أمسكني حزم النور وطيرهم ورائي ..

ليجمّلني وأصير.. أملاً

لا أحد منهم..

ربّى أمومتي لأمارس طقوسها.. عليه..

عطّرني بريح الورق.. 

وأوقفني على هيئة تمثال..

فأخضع عيون الناظرين.. لثنائي

لوّن وريقاتي بألوان الربيع.. 

ورسمني على أبهى صورة..

قطّع حبل مشنقتي.. 

ليتلقفني بأحضانه.. 

فحرّرني من كفني

وحاك لي ثوباً من ياسمين..

فصرت إن نظرت إليّ.. 

أملت التنعم في فردوسه العظيم..

فمنحته شرف اللقب..

رغم علمي التام..

أن انتهاك الفراق..

لحرمات روحي.. محتم..

وأن الموت فيه.. محتم

لكني..

منحته اللقب.. 

منحتك يا حبيبي..

شرف اللقب.. 

وكلي ثقة أنه ما من أحد منهم..

يستحق اللقب الجليل.. 

سواك.. حبيبي..

 

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