خاطرة | اللاشيء

خاطرة | اللاشيء

..

ومثلي أنا من كان لا يهوى فيض مشاعره، أَوَمَن كان يلمسُ تعبي، هل من أحدٍ هنا - أنا لستُ بخيرٍ- على ما يبدو.. 

ولست مكوّنة من نفسي الآن عليَّ البوح بذلك أشق عليّ عناء الطريق أم هو الجبروت الذي فوق ظهر سيهوي قريباً -كنت أعتقد- كل فكرة تتداخل مع فكرة في وعاء مليءٍ من تلك وكأن لها حرية التجول داخلي..

أحقاً هي تخط آثارها على جسدي؟

ذلك الألم الذي يراود حلمي لم يصبر حتى أستيقظ بقي جالساً ينهش في رأسي حتى أدماه.. 

استيقظت يومها مبعثراً كأن بركاناً قد انهار أو أن ذاك البناء الذي أعياه حطامه قد انهار.. 

لم أدرك حقيقة الأمر، لكنني أدرك قطعاً أن مَن تبعثر هو أنا لم أُجِد يومها قول صباح الخير يجب أولاً تجميع حروفها من خيوط الشمس التي تخترق جسدي ومن رائحة المطر.. 

لا، كان ذلك أشبه بمشهد مقتطف من أحدِ الأفلامِ الساذجة..

كان عليَّ جَمعُ الأحرفِ تلك مِن انهيارِ لغتي وتهتكِ عافيتي يجبُ جمعها من آخرِ يومٍ كنتُ قد نِمتُ فيه أو أولِ يومٍ سيكونُ بعد التجاوز ونفسٍ عميقٍ يتجاوزُ حدودَ رئتاي.. 

أتعلم أو دعنا نتكلم بهذه الطريقة؛ إنَّ للحدودِ أثرٌ لا يفصلُ الإنسانَ عن العالمِ أو عن سكانِ العالم إنما يفصلهُ عن جسدهِ كُل مَن علا عليها سقط وكُل من دنا تحتها ارتمى فتفيأُ في ظلها عبثاً قوةُ المشاعرِ تأتي سلباً وطاقةُ الحبِ تحتضنها..

ويعيشا سوياً ويرميا قمامةَ التشتتِ في رأسِ الضحية ليعيشَ ذاك في وضعيةِ الاحترازيّ غيرِ المجبرِ على الاستماعِ.. 

وتبدأُ رحلةُ البحث عن الذات هنا ينفصلُ الجسدُ هو سيذهبُ ليتسوق في سوقِ العلاماتِ السوداءِ تَحتَ المجراتِ والخطوطِ الزرقاء أعلى الطرق.. 

ويترك الروح وحدها تعبث بنفسها وخلف اللا أَلفُ لا وخلف النَعمِ ألفُ قسوة.. 

ويمضي الموسِمُ غيرَ آبهين لما قد حصل ارفع لؤلؤتاك ها ذا أنت انظر لنفسك واستبعد نفسك الأخرى.. 

اترك الباب مقفلاً وامسك طرفَ المغسلة لا تمسكهُ بقسوة أنت من سيتألم حينها اقطع ذاك السيل وارفع لؤلؤتاك مرّة أخرى.. 

انظر ذاكَ أنت لكن توقف من الذي خلفك أتعلم إنهُ الأنت الآخر جاءَ ليَحضنك..

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